U TURN

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

वैलकम बैक डियर फ्रैंड !!!




आज तो गज़ब हो गया. मेरा दोस्‍त, मेरा अपना चाय का कप जो आफिस में दो दिन पहले खो गया था......आज वापस मिल गया. कसम से ऐसा लग रहा है कि कोई बिछड़ा हुआ बरसों बाद मिल गया हो. पिछले कुछ रोज में अपने चाय के कप से मेरी गहरी दोस्‍ती हो गई थी . दरअसल कप एक अजीज दोस्‍त ने सिकिम्‍म या दार्जिलिंग से लौटकर उपहार के रूप में दिया था. सो कप भी अजीज हो गया. यूं तो ये जरूर कॉफी या ऐसी ही किसी खास चीज को पीने के लिए बना होगा. पर ये मेरा सुबह 11 बजे के फर्स्‍ट आफिशियल टी ब्रेक का कई महीनों से संगी है. शायद इसीलिए सरकारी कप में चाय अब बेस्‍वाद लगने लगी थी. खैर, .....दो दिन पहले बेख्‍याली में किसी दोस्‍त से गुफ्तगू के दौरान मैं इसे अपने कमरे से बाहर कहीं टिका कर भूल गया और जब कप का ख्‍याल आया तो बहुत देर हो चुकी थी. कप गायब था. अब कमबख्‍त चाय पीने में कोई स्‍वाद नहीं आ रहा था. तभी चपरासी ने बताया कि साहब आप जैसा कप तो मैंने आज इसी गलियारे में लाल सी शर्ट पहने एक लड़के के हाथ में देखा था. मुझे लगा उसके पास भी आप जैसा ही कप होगा.

 बस फिर क्‍या था.....लाल शर्ट वाले लड़के की खोज शुरू हुई और कमरे का दरवाजा खुला छोड़ दिया और निगाहें गलियारे से गुजरने वाले हर लाल शर्ट वाले आदमी को खोज रही थीं. कसम से किसी की शर्ट जरा भी लाल नज़र आती तो वो चोर सा नज़र आता. मैं हर बार चपरासी को पूछता कि 'देखना कहीं ये तो नहीं था'. कई बार शर्म भी आ रही थी लोग क्‍या सोचेंगे ....एक टुच्‍चे से कप पर इतनी जान दे रखी है. पर सच में मन तो उसी मैं अटका था. फिर चपरासी को ही हिम्‍मत करके कहा कि जरा बाहर के एक दो चक्‍कर लगा कर उस लाल शर्ट वाले लड़के को ढूंढो तो सही. चपरासी के कमरे से बाहर जाते ही मैं अपनी सीट पर उस कप की खूबसूरत बनावट और लाल-पीले रंगों के बीच उस बडे से सांप को याद करने लगा जो मुझे सरकारी तंत्र में बैठे ऐसे सांपों की याद दिलाता था. मैंने न जाने कितने लोगों की शक्‍लें उस सांप में देखी थी. कभी डर सा भी लगता था कि चाय के कप पर सांप वाप टाइप की चीजें नहीं होनी चाहिएं....पर फिर ख्‍याल आया कि बनाने वाले ने सोच समझ कर ही बनाया होगा.

हां, इस कप में चाय पीकर कभी-कभी लगता था कि मानो चाय पीते ही व्‍यवस्‍था में घुस चके ऐसे सांपो से लड़ने के लिए कोई ताकत शरीर में आ जाएगी. खैर मैं अभी कप की याद में डूबा ही था कि आधे घंटे बाद चपरासी ने आकर मेरा कप मेरी नज़रों के सामने टिका दिया. चोर मिल गया था, शायद .....चोर कहना ठीक न होगा, ऐेसे कप को अकेला देखकर भला किसका ईमान नहीं डगमगाएगा ? सो ले गया होगा उठा कर. खैर मेरी आंखों का नूर...मेरा जिगरी वापस आ गया था. दिल गार्डन गार्डन था. तुरंत चाय आर्डर की और आने पर हर एक चुस्‍की के साथ कहा.......वैलकम बैक डियर फ्रैंड !!!!!

सोमवार, 30 जुलाई 2012

12 वां ओसियान फिल्‍म महोत्‍सव : दिल्‍ली के दिल में सिनेमा का समंदर

ओसियान एक बार फिर दिल्‍ली की जमीन पर लौटा है और सिरी फोर्ट ऑडिटो‍रियम एक बार फिर गुलजार है देश दुनिया की नायाब फिल्‍मों से. फिल्‍मों का समंदर सिरी फोर्ट में लहरा रहा है और फिल्‍मों के दीवाने इसमें डूब डूब कर मोती चुन रहे हैं. लगभग 50 देशों की 200 से अधिक फिल्‍मों के साथ 12 वां ओसियान फिल्‍म समारोह भारतीय, एशियाई और अरब देशों के सिनेमा का एक अद्वितीय मंच बन कर उभर रहा है. पिछले दो दिनों से चल रहे इस फिल्‍म महोत्‍सव में भाग ले रही विदेशी फिल्‍मों और इन फिल्‍मों से जुड़े लोगों का जोश खरोश के साथ हिस्‍सा लेना दिल्‍ली को अंतराष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव के लिए सबसे मुनासिब जगह साबित करता है. जहां न केवल विदेशी मेहमान इस महोत्‍सव का हिस्‍सा बनकर कुछ नया महसूस कर रहे हैं वहीं दिल्‍लीवाले भी पूरे दिल से इस फैस्‍ट का लुत्‍फ उठा रहे हैं. इस बार के महोत्‍सव की थीम ‘रचनात्‍मक विचार और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता’ रखी गई है.

पूरे परिसर में आप फिल्‍म निर्देशकों, कलाकारों और फिल्‍मों की नुक्‍ताचीनी करने वाले ब्‍लॉगचियों को इधर से उधर होते देख सकते हैं. मजे की बात ये है कि आप फिल्‍म देख देख कर थक सकते हैं पर ओसियान आपको फिल्‍म दिखाने से नहीं थकेगा. एक समय में पांच अलग-अलग स्‍क्रीन पर फिल्‍में चल रही हैं. लेकिन हम एक साथ पांच जगह नहीं हो सकते. सो मामला चूजी होने का हो जाता है. जिन फिल्‍मों की तारीफ पहले से सुन रखी है उन्‍हें अपने शेड्यूल में शामिल करने में तो कोई कठिनाई नहीं है. पर असल रोमांच है अनजानी और अनसुनी फिल्‍मों को अचानक से ट्राई करने में. कुछ फिल्‍मों के ब्रोशर से थोड़ी बहुत जानकारी मिल सकती है पर कुछ के बारे में नाम से ज्‍यादा कुछ नहीं. रिस्‍क लेकर ट्राई करने पर कभी कभी जैकपॉट भी हाथ लग जाता है.

ऐसे मौकों पर मेरी प्राथमिकता हमेशा उन फिल्‍मों के प्रति रहती है जो आसानी से न देखी जा सकती हों या फिर बड़े पर्दे पर न देख पाने की संभावना हो. अंतराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में जाकर भी अगर पॉपुलर हिंदी फिल्‍में ही देखी तो क्‍या ख़ाक सिनेमा देखा. एक ही जगह जब ईरानी, ताईवानी, जापानी, जर्मन, फ्रेंच, अल्‍जीरियाई, तुर्किश, कोरियाई, चीनी और इण्‍डोनेशियाई फिल्‍में देखने को मिल जाएं तो किसी सिनेमा प्रेमी के लिए इससे बड़ी सौगात नहीं हो सकती.

इस बार ओसियान की शुरूआत निर्देशक कैईची सातो की एक जापानी एनीमे‍टिड फिल्‍म ‘असुरा’ से हुई है. एनीमेशन और एनीमे‍टिड फिल्‍में और खासकर जापानी एनीमेटेड फिल्‍में समारोह में खूब पसंद की जा रही हैं. समारोह के तीसरे दिन ऐसी ही एक और एनीमेटेड फिल्‍म Tatsumi देखने का मुझे मौका लगा. जापानी लोग पूरी दुनिया में एनीमेशन के क्षेत्र में हो रहे प्रयोगों से हटकर एनीमेशन के माध्‍यम से गंभीर सिनेमा तैयार करने में अपना लोहा मनवा चुके हैं. तात्‍सुमी असल में एनीमेशन में एक मंगा आर्टिस्‍ट योशिहिरो तात्‍सुमी की ऑटोबायोग्राफी है. योशिहिरो ने गेकिगा शैली में एनीमेशन के जरिए अपनी कहानियां दुनिया के सामने रखीं. तात्‍सुमी योशिहिरो के जीवन के घटनाक्रमों और उनके कामिक्‍स की कहानियों का अनूठा कोलाज है. जो अपने साथ जापान की संस्‍कृति और वहां की जीवन शैली में हमें झांकने का भरपूर अवसर देती है.

द ओरेंज सूट की स्‍क्रीनिंग के बाद निर्देशक दारियुश मेहरजुई
दर्शकों से बातचीत करते हए
कमोबेश हर विदेशी फिल्‍म आपको अपने देश की संस्‍कृति, वहां के लोगों की सोच, रवायतों और आदतों से रू-ब-रू करती चलती है. यहां एक बात विशेष रूप से कहने की है कि फिल्‍में विदेशी भाषा में हाने के बावजूद सबटाइटल्‍स के साथ बिल्‍कुल अपरिचित नहीं लगतीं. यहां तक की एशियाई और अरब देशों के बहुत से मसले और लोगों की जीवन शैली के बहुत से हिस्‍से एक जैसे लगते हैं. शायद यही वजह है कि जब मैं दारियुश मेहरजुई की ईरानी फिल्‍म ‘द ऑरेंज सूट’ देखता हूं तो शहरी कूड़े कचरे की समस्‍या को केन्‍द्र में रख कर बनाई गई यह फिल्‍म मुझे किसी भी भारतीय शहर की कचरे की समस्‍या के लिए कम प्रासंगिक नहीं लगती. एक पल के लिए लगता है कि फिल्‍म ईरान में नहीं बल्कि यहीं कहीं दिल्‍ली में शूट की गई है. ‘द ऑरेंज सूट’ कहानी है एक ऐसे फोटो जर्नलिस्‍ट की जिसे कचरा साफ करने वाले स्‍ट्रीट स्‍वीपर के काम से इश्‍क हो जाता है और वह बड़े चाव से स्‍वीपर की नौकरी हासिल कर ईरान की गलियों को साफ करता है. जिस मैंटल क्‍लटर की बात फिल्‍म का नायक हामिद ओबेन करता है उसी मेंटल क्‍लटर से किसी भी देश की शहरी जिंदगी परेशान है. ओबेन शहर की गंदगी को साफ करते हुए अपनी आत्‍मा को शुद्ध करने की कोशिश में है. फिल्‍म के शीर्षक में ऑरेंज सूट स्‍ट्रीट स्‍वीपर की वर्दी के रंग से आया है. यूं तो मेहरजुई की इस फिल्‍म में एक साथ कई मुद्दे समानांतर रूप से चलते हैं पर जिस सादगी से उन्‍होने शहरी कचरे की समस्‍या को दिखाया है वह वाकई काबिले तारीफ है.

इस बार के फिल्‍म फैस्‍ट में जहां सैक्‍स और सेंसरशिप पर खुल कर चर्चा हो रही है वहीं जापानी सॉफ्टकोर पोर्नोग्राफिक थियेटरिकल फिल्‍म शैली में पिंक फिल्‍में भी चर्चा के केन्‍द्र में हैं. गो गो गो सेकेंड टाइम वर्जिन, एक्‍सटेसी ऑफ एंजेल्‍स, द स्‍मैल ऑफ करी एण्‍ड राइस और ‘कॉस्मिक सैक्‍स’ जैसी फिल्‍मों का सिनेमा प्रेमियों को इंतजार है.

अपने पसंदीदा कलाकारों को समारोह में अपने अगल बगल में देख पाना यकीनन इस सरूर को और बढ़ा देता है. पर मेरी राय में फिल्‍म समारोह का फायदा अपने चहेते कलाकारों से ज्‍यादा नई प्रतिभाओं से रूबरू होने और चुनींदा फिल्‍मों पर समय लगाने के लिए उठाना चाहिए. इस समारोह में मणि कौल की कुछ फिल्‍में ऑरिजनल प्रिंट के साथ आ रही हैं. जिन्‍हें देखना वन्‍स इन ए लाइफ टाइम अनुभव होगा. मणि कौल की ध्रपद और सिद्धेश्‍वरी कुछ हट कर उम्‍दा देखने वालों के लिए एक वर्चुअल ट्रीट से कम नहीं है. वहीं भारतीय खंड में कुछ चुनींदा फिल्‍में दर्शकों की प्राथमिकताओं पर हैं. दुनियां भर में धूम मचा चुकी प्रशांत भार्गव की फिल्‍म पतंग, अजय बहल की बी.ए. पास, अजीता सुचित्रा वीरा की ‘बैलेड ऑफ रूस्‍तम’ और अमिताभ चक्रवर्ती की कॉस्मिक सैक्‍स  दर्शकों द्वारा खूब सराही जा रही हैं.

अगर आप अभी तक इस महोत्‍सव का हिस्‍सा नहीं बन पाए और बहुत कुछ मिस कर चुके हैं तो भी निराश न हों क्‍योंकि अभी अगले कुछ दिनों में ऑरेंज सूट ( 31 जुलाई को दूसरी बार दिखाई जाएगी), शांघाई, प्राग, 10 एमएल लव, हंसा, नो मैन्‍स जोन, दिस इज नॉट ए फिल्‍म, एक्‍सप्रैस, बैलेड ऑफ रूस्‍तम, डैथ फॉर सेल, लेबिरिन्‍थ, बेबी फैक्‍टरी और कुछ शॉर्ट फिल्‍मों समेत ढ़ेरों उम्‍दा फिल्‍में दिखाई जाएंगी. यही नहीं 5 अगस्‍त तक नियमित रूप से देश दुनियां के‍ फिल्‍मकार और सिनेमा जगत से जुड़ी हस्तियां सिनेमा के तमाम पहलुओं पर चर्चा करते रहेंगे. फिल्‍म समारोह की और बातें आपसे होती रहेंगी तब तक मैं आपके लिए इस समुद्र मंथन में से कुछ और मोती चुन कर लाता हूं. अलविदा.  

फिल्‍म समारोह से जुड़ी अन्‍य जानकारियों के लिए ओसियान की आधिकारिक वेबसाइट http://cinefan.osians.com/ को विजिट करें। 

-सौरभ आर्य, 

गुरुवार, 8 मार्च 2012

इस होली पर मैं कुछ ऐसे रंग लाया हूं.....



इस होली पर मैं कुछ ऐसे रंग लाया हूं

चढ़ें जो मन पर, महकें तन पर संग लाया हूं।


रंग है अहसास का, आस का, विश्‍वास का

रंग सबके मन में खिलने वाले इस मधुमास का,
कष्‍ट में भी मुस्‍कुराकर आगे ही बढ़ते रहें
रंग ऐसे हर्ष का, उत्‍साह का, उल्‍लास का । 




रंग शक्ति के, आसक्ति के और प्रेम की अभिव्‍यक्ति के

रंग करूणा के, दया के, धर्म के और भक्ति के,

प्रेम जिनकी कल्‍पना में, स्‍नेह ही संकल्‍पना में

रंग अमीरों के, गरीबों के, हर उस ऐसे व्‍यक्ति के।


होली के हुड़दंग में भी प्रेम का संदेश दें जो
रंग मधुरता के, सरसता के और समरसता के,
रंग जो सीधे मन को छू लें, ऊंचा-नीचा भेद भूलें
रंग निश्‍छल भावना के, प्रीत के और आस्‍था के। 

इस होली पर मैं कुछ ऐसे रंग लाया हूं..........


-सौरभ आर्य

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

‘आम जनता’

आम जनता
- सौरभ आर्य

आम जनता नित्‍य पिसती, ज्‍यों मसाले पिस रहे हों
चंद टुकडों के सहारे, जिंदगी को घिस रहे हों,
भूख के आधार पर प्रगति की कैसी कथा है
वंचितों के स्‍वर से फूटी, कष्‍ट की अद्भुत व्‍यथा है।


राष्‍ट्र प्रगति कर रहा है, कहना तो आसान है
पर फांसियों पर झूलता क्‍यों, इस देश का किसान है,
इस गरीबी और अमीरी के सनातन युद्ध में
देश दो भागों में बंटता पर हमें अभिमान है।



भूकम्‍प से गर बच गए तो, भूख से निश्चित मरेंगे
इस जमीं के देवता कब, जाने इस दुःख को हरेंगे,
वोट देकर जिनको भेजा दिल्‍ली के संसद भवन में
उस भूल का फिर खामियाजा, आमजन कब तक भरेंगे ।


सत्‍याग्रह के गीत गाता, ये पपीहा कौन है
रक्‍त रंजित गोधरा पर का वो मसीहा कौन है,
इंसानियत का कत्‍ल होता, दिन दहाड़े चौक पर
सभ्‍यता के इस समर में, हारा जीता कौन है ।

बम धमाकों में जो मरते आमजन हम तुम ही जैसे
मृत्‍यु के इस शोक पर भी नाच नंगे कैसे-कैसे,
लोकतंत्र के इस भवन को हम नमन कैसे करें अब
आमजन की वेदना पर मौन धर के बैठें हैं सब ।


चल रही ऐसी हवाएं माना कि तूफान हो
तीर तरकश का धनुष पर, अब आखिरी संधान हो,
कस कमर अब उतरो रण में, चाहे प्राण ही बलिदान हो
राष्‍ट्रभक्ति के हवन में, हर शक्ति के आह्वान हो ।


- जय हिन्‍द - 
(दिनांक 19.09.2011 को वस्‍त्र मंत्रालय में आयोजित हिन्‍दी काव्‍य पाठ प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्‍कार प्राप्‍त्‍ा कविता)

बुधवार, 13 जुलाई 2011

द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड: थैंक यू एण्‍ड गुड बाय

  


      ब्रिटेन का एक अख़बार न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड जो 168 वर्ष पूर्व शुरू हुआ और कई पीढि़यों का संगी-साथी बना अंतत: चंद रोज पहले बंद कर दिया गया। अपने अंतिम अंक थैंक यू एण्‍ड गुड बाय के साथ 27 लाख की प्रसार संख्‍या और न्‍यूज कार्पोरेशन की दुधारू गाय न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड का अचानक बंद हो जाना कोई सामान्‍य घटना नहीं है। लेकिन इसके असमय अंत के लिए आत्‍महंता की भूमिका न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड ने स्‍वंय ही निभाई। पत्रकारिता जब धर्म न रहकर पूर्णतया व्‍यवसाय बन जाएगी तब यही होगा। साध्‍य के लिए साधन की शुचिता के प्रश्‍न पर इस अख़बार ने अपनी आंखें मूंद लीं। गंदा है पर क्‍या करें, धंधा है के तर्क को आधार बना कर चलने वालों ने ही पत्रकारिता को कोठे पर पहुंचा दिया है ।

      शुरूआती दौर में गंभीर खबरों और मनोरंजन से भरपूर हल्‍की फुल्‍की खबरों के बीच के नाजुक संतुलन को कायम कर पूरी तरह एक टेब्‍लॉयड की भूमिका में अपने स्‍लोगन ऑल ह्यूमन लाइफ इज देअर को चरितार्थ किया और लोगों ने भी इस अख़बार को हाथों हाथ लिया । मगर फिर वह हुआ जो हर धंधे में होता है... द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड को सैम कैम्‍पबेल के संपादन में निकलने वाले द संडे पीपल ने कड़ी टक्‍कर दी। खोजी पत्रकारिता के दम पर द पीपल तेजी से बुलंदियों को छूने लगा और द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड की प्रसार संख्‍या धराशायी होने लगी। ऐसे मुश्किल दौर में द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड का हाथ लौरी मैनीफोल्‍ड ने थाम लिया। मैनीफोल्‍ड को यदि आधुनिक खोजी पत्र‍कारिता का पिता कहा जाए तो शायद गलत न होगा। जल्‍द ही मैनीफोल्‍ड ने खाजी पत्रकारिता के तौर तरीकों में प्रशिक्षण देकर ट्रेवर कैम्‍पसन, माईक गैब्‍बर्ट और मज़ह‍र महमूद जैसे पत्रकारों की जमात तैयार की । मैनीफोल्‍ड ने सनसनीखेज खबरों के एक नये युग का सूत्रपात तो किया मगर किसी भी कीमत पर शॉर्ट कट और अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड ने समय- समय पर जनहित के लिए तमाम ऐसे खुलासे किए जिनके धमाकों की गूंज लंबे समय तक सुनाई देगी।

      पर वक्‍त के साथ सब बदलता गया । उधर द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड के धुर विरोधी द पीपल ने सैक्‍स और सेलेब्रिटियों को लेकर एक सीरीज शुरू की तो द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड ने छल-प्रपंच का सहारा लेकर आगे बढ़ना शुरू कर दिया । इसके बाद पादरियों, राजनेताओं और फिल्‍मी हस्तियों समेत तमाम रसूखदारों के यौन अवगुणों के पर्दाफाश की कहानियां छापना इसका रेगूलर फीचर बन गया। लोग चटखारे लेकर पढ़ रहे थे पर सैक्‍सी और सीरियस खबरों का संतुलन लगातार बिगड़ रहा था। शायद ब्रिटेन के समाज में आ रहे बदलावों के साथ पाठकों की पसंद भी बदल रही थी। अब अंतरंग संबंधों की चासनी में लिपटी खबरें और बेहद निजी बातें भी सार्वजनिक होने लगीं थीं। अख़बार छाप रहा था क्‍योंकि पाठक यही पढ़ना चाहता था। अधनंगी तस्‍वीरें, लोगों की नितांत व्‍यक्तिगत बातचीत, हैक्‍ड ई-मेल्‍स और मोबाइल संदेश छपना अब आम हो चला था । पर इस बीच अख़बार सही और गलत के बीच की सीमा-रेखा खींचना भूल गया। धंधे के नाम पर सब जायज था और बस यहीं से द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड के पतन की कहानी शुरू हो गई।
     
      ये सच है कि लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक के लिए कोई अख़बार कभी बंद नहीं हुआ। पर द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड ने सारी हदें पार कर दीं और इसने फोन टेप करने वाले तकनीशियनों, हैकरों की सेवाएं लेकर 7 जुलाई 2005 को लंदन आतंकी हमले में मारे गए एवं घायल हुए लोगों के रिश्‍तेदारों की फोन पर बातचीत एवं ई-मेल को हैक किया और छापा। पहली बार त्रासदी के छणों में लोगों की व्‍याकुलता और अभिव्‍यक्ति से अख़बार में मिर्च-मसाला डाला गया। लोगों की निजता के हनन नाम की अब कोई चीज नहीं रह गई थी । लेकिन अब शायद पाप का घड़ा भर चुका था। बवाल मचा और इस कदर मचा कि रूपर्ट मर्डोक का पूरा न्‍यूज कार्पोरेशन खतरे में पड़ गया। अलबत्‍ता ये रूपर्ट मर्डोक ही थे जिन्‍होंने द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड को पीत पत्रकारिता के गर्त में धकेला था। न्‍यूज इंटरनेशनल की सीईओ रेबेका ब्रूक्‍स विरोध के बावजूद अभी भी अपने पद पर बनी हुई हैं। रेबेका, ब्रिटिश प्रधानमंत्री कैमरून, पूर्व संपादक एंडी काउल्‍सन जो बाद में प्रधानमंत्री के जन संचार निदेशक बन गए, के आपसी समीकरण काफी कुछ कहते हैं। पर फिलहाल यहाँ प्रश्‍न एक अख़बार की असमय मृत्‍यु का है।

        बेशक इस अख़बार के अंत के साथ पत्रकारिता के एक स्‍याह युग का अवसान हो गया मगर मुनाफे और प्रतिस्‍पर्धा के लिए द न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड ने जिन मर्यादाओं का उल्‍लंघन किया वे भविष्‍य के लिए कुछ मापदंडों की ओर इशारा करती हैं जिन्‍हें टैब्‍लॉयड जर्नलिज्‍म के लिए पैमाना बनाना होगा ताकि फिर किसी अखबार को इस तरह गुडबाय न करना पड़े।     

 -सौरभ आर्य  

बुधवार, 6 जुलाई 2011

'आई हेट यू, लाइक आई लव यू'.








पिछले शुक्रवार से सुर्खियां बटोर रही फिल्‍म डेल्‍ही बेली पर कुछ ब्‍लॉग पढ़े । कुछ लेखक बंधु इसे हिन्‍दी सिनेमा में नए प्रयोग तो कुछ इस फिल्‍म की भाषा को यूथ की भाषा कहकर महिमामंडित करने में जुटे थे और मौहल्‍ला लाइव पर मिहिर पंड्या इसे स्‍त्री के समर्थन में खड़ी फिल्‍म करार दे रहे थे। कुछ संशय था सो कल शाम कनॉट प्‍लेस के ऑडियन सिनेमा में ये फिल्‍म देख डाली। इस थियेटर का चयन भी मैंने मिहिर के तर्कों को कसौटी पर परखने के लिए किया कि क्‍या देहली बेली वाकई स्‍त्री के साथ खड़ी है। दिल्‍ली का कनॉट प्‍लेस दिल्‍ली ही नहीं देश के संभ्रात कहे जाने वाले धनाड्य परिवारों का पसंदीदा इलाका है। देश भर में जो आसानी से हलक के नीचे न उतरे उसके यहां आसानी से हजम हो जाने के ज्‍यादा चांसेज हैं। पर यहां फिल्‍म से पहले, फिल्‍म के दौरान और खास तौर पर फिल्‍म के बाद लोगों (विशेषकर युवतियों/महिलाओं) की प्रतिक्रिया दिलचस्‍प थी। मैं फिल्‍म का मूल यानि कि अंग्रेजी वर्शन देख रहा था...भाषा किसी संस्‍कृति की सीधी प्रतिनिधी होती है और यही काम यहां अंग्रेजी कर रही थी...जो गालियां कहीं कहीं अंग्रेजी में अत्‍यंत सहज लग रहीं थी उनके हिंदी अनुवाद की कल्‍पना मात्र से ही सिहरन पैदा हो रही थी। हां, इसके हिन्‍दी वर्शन के कुछ संवाद कान खड़े करने वाले हैं...जिन्‍हें ऐसा होने से बचाया जा सकता था...पर शायद जानबूझ कर रखा गया था। गंदा है पर क्‍या करें धंधा है की फिलॉसफी पर बेशर्मी को भी लैजिटिमेट का दर्जा कैसे दिया जाए कोई इनसे सीखे। फिल्‍म में गाली कहीं कहीं जम रही थी तो वहीं ज्‍यादातर जगहों पर जबरदस्‍ती जमाई गई प्रतीत हो रही थी।

  मेरी बगल वाली सीट पर एक युवती जो अपने ब्‍वॉयफ्रेंड के साथ फिल्‍म देखने आई थी, पूरी फिल्‍म के दौरान उसका हाथ तो मुंह पर था पर हां हर अल्‍ट्रा-बोल्‍ड और हाजमा बिगाडने वाली चीज पर हल्‍का सा ठहाका लगाकर एक '' सर्टिफिकेट फिल्‍म को 'यू' सर्टिफिकेट वाली फिल्‍म के अंदाज में देखने और खुद को असहज स्थिति से बचाने/ हाजमा ठीक रखने की असफल सी कोशिश करती रही। पूरी फिल्‍म के दौरान 'ओह शिट्ट' और 'ओह फक' के स्‍वर गुंजायमान थे सवाल था कि जिस तरह से उपरोक्त दोनों हैल्पिंग वर्ब्‍स को हमारे समाज (खासकर मैट्रो शहरों का युवा वर्ग)ने आसानी से पचाया है वैसे ही वे नई गालियों और नई हैल्पिंग वर्ब्‍स को पचाने में सक्षम हैं या नहीं। फिल्‍म हर फ्रेम के साथ आपको चौंकाती है...जिसकी आप उम्‍मीद नहीं करेंगे वही वही देखने को मिलेगा। सिनेमा में नए प्रयोग की दुहाई के नाम पर शायद आमिर ख़ान समाज के हाजमे की ताकत का ही जायजा ले रहे हैं। डीके बोस यूं ही नहीं भागा उसे बहुत सोच समझ कर भगाया जा रहा है...यत्र तत्र सर्वत्र बरसती गालियों और नवस्‍थापित स्‍लैंग्‍स पर शायद सेंसर बोर्ड बीप का बटन दबाना ही भूल गया। पेशे से अनुवादक होने से दिमाग खुद ब खुद हर नई गाली का निकटतम हिन्‍दी पर्याय ढूंढ रहा था पर फिल्‍म का हिंदी वर्शन तैयार हो चुका है और दौड़ रहा है। कोई आश्‍चर्य नहीं था कि ऐसे शब्‍दों के अनुवाद से उपजी कुरूपता को निर्माता निर्देशक भाषा के मत्‍थे जड़ देगा और इस क्‍लासिकल नंगई से खूब पैसा वसूलेगा । मुझे कहीं भी ये फिल्‍म स्‍त्री के साथ खड़ी दिखाई न‍हीं दी...फिल्‍म की नायिका हां नायिका कहना ही उचित होगा, सिगरेट पीकर, टूटे शीशे की कार में खुलेआम लंबा चुंबन देकर या फिर होटल के कमरे में गरम आवाजों से आफत टाल कर क्‍या वास्‍तव में एक सशक्‍त स्‍त्री के प्रतिमान स्‍थापित कर रही है। साफ दिखता है कि निर्माता ने बड़ी चतुराई से इस सॉफ्ट पोर्न नुमा चीज को सिनेमा का नया प्रयोग करार दिया है। देहली बेली टिटिलेशन देने में तो सफल नज़र आती है पर कोई संदेश देने में नाकाम ही रही। ये सारे प्रयोग/हरकतें 'प्‍यार का पंचनामा' में भी किए गए पर एक कंट्रोल्‍ड अंदाज में । शायद कुछ लोग बहुत सोच समझ कर सिनेमा को एक नई दिशा दे रहे हैं। मुझे पूरा यकीन है जल्‍द ही दर्शक इन घटिया हथकंडों को नकार देगा। फिल्‍म की समाप्ति पर भीड़ पर मेरे आगे चल रही लड़की ने जब अपने साथी से कहा ''यू नो !! दे हैव डैलीब्रेटली पुट ऑल दिस...ओह गौड़. इट वॉज़ टू मच'' तो फिल्‍मकार की नीयत साफ हो गई। वो समझता है कि दर्शक बेवकूफ है. 

      आमिर के पूर्व के नायाब प्रयोगों का जितना स्‍वागत किया गया शायद उतना ही देहली बेली के इस तथाकथित प्रयोग को नकारा जाना चाहिए। आमिर के लिए मैं इतना ही कहना चाहूंगा....'आई हेट यू, लाइक आई लव यू'.

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

अनिल भट्ट की कविता sometimes का हिन्‍दी अनुवाद

Sometimes

Sometimes I feel

that sometimes you feel

what I feel sometimes

Sometimes you feel

that sometimes i feel

what you feel sometimes

yet often we feel

that we shouldn’t often feel

what we feel sometimes. - from Heart strings by Anil Bhatt



कभी कभी मैं ये महसूस करता हूं,

कि कभी कभी तुम महसूस करती हो

मैं जो कभी कभी महसूस करता हूं।


कभी कभी तुम ये महसूस करती हो

कि कभी कभी मैं महसूस करता हूं

कभी कभी जो तुम महसूस करती हो।


फिर भी अक्‍सर हम महसूस करते हैं

हमें अक्‍सर महसूस नहीं करना चाहिए

हम जो कभी कभी महसूस करते हैं।

अनुवाद- सौरभ आर्य

गुरुवार, 6 जनवरी 2011

बेदर्द ठंड और खाली पेट गुजरी एक रात....


कल रात ऑफिस से आते आते रात के 9 बज गए और थकान और हड्डीयों तक घुस चुकी ठंड ने रजाई की शरण लेने पर मजबूर कर दिया और सोचा दस मिनट इस तीसरे आयाम में ठंड से निजात प्राप्‍त की जाए। बस फिर क्‍या था...कुछ उलझे से ख्‍यालों ने होश को आ घेरा सारे विचार आपस में गुथ कर गड्डमड होने लगे...फिर क्‍या हुआ साफ साफ याद नहीं । शायद नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया। गैस के पास रखा डिनर इस इंतजार में सुस्‍ताता रहा कि रजाई में दुबका शख्‍स अब निकलेगा तब निकलेगा। पर ठंड ने रूह को इस कदर सताया था कि भूख पेट की अतल गहराइयों में जा छुपी और पूरी रात वहीं दुबकी रही। अचानक पेट में कोई हलचल हुई और आँख खुल गई .... कमरे की लाइट जल रही थी, मेरे ऊपर रजाई और रजाई के ऊपर अखबार पसरा पड़ा था। धीमी धीमी आवाज में पास चल रहे रेडियो पर कोई कुछ गा रहा था। गली का चौकीदार नीचे जोर जोर से डंडा पटका कर अपनी हाजिरी लगा रहा था। घडी में झांका तो देखा की छोटी सुंई पाँच के पास लटक रही है....और भूख पूरे शरीर में भटक रही है।

सोमवार, 15 नवंबर 2010

बेशर्मी की हद कहां है ?


अब टी वी पर सूहागरात का भी प्रसारण होने लगा है। बैडरूम के दृश्‍य अब ड्राइंग रूम में सीधे प्रसारित किए जा रहे हैं। और हमारी पाचन क्षमता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। श्‍लील और अश्‍लील की परिभाषाएं एक दूसरे में समा जाने को आतुर हो रही हैं। सुना है पामेला एण्‍डरसन बिग बॉस में अतिथि के रूप में आ रही हैं। अब पामेला एण्‍डरसन हिन्‍दी धारावाहिक में आकर क्‍या दिखाएंगी यह सब जानते हैं। बिग बॉस की/ के डाली के संवाद सेंसर नाम की चिडिया के अस्तित्‍व पर ही प्रश्‍न चिन्‍ह लगा रहे हैं। पाकिस्‍तानी कलाकार वीना मलिक कुछ दिन पहले कुछ करती नजर आईं तो चंद रोज पहले नहाने के बाद बाथरूम ये बाहर आते समय उनका तौलिया गिर गया। अगर टी वी कार्यक्रम इसी गति से प्रगति करते रहे तो कुछ दिनों में पोर्न सामग्री का प्रसारण भी वैध हो जाएगा। सुना है कि अमर सिं‍ह भी बिग बॉस में जाना चाहते हैं।

वहीं दूसरी तरफ राखी सावंत भी अपनी अदालत लगा कर लागों को आत्‍महत्‍या पर मजबूर कर रही है। जिनके दामन पर खुद हजारों दाग हैं वो दूसरों को सही गलत का सर्टिफिकेट दे रहे हैं। तमाशा चल रहा है। टी आर पी बढ रही है। लोग मरें तो मरें...निर्माता और प्रसारकों को इससे क्‍या? टीवी पर नंगा नाच हो तो हेा पब्लिक तो देख रही है ना?

मेरी सरकार से ऐसे बेतूके कार्यक्रमों पर रोक लगाने गुजारिश है।