सिनेमा की दुनिया के महान चित्रकार रितुपर्णो घोष के साथ यह तस्वीर 5 अगस्त, 2012 की रात 8 बजकर, 53 मिनट पर ली गई थी. रितुपर्णों बीते गुरूवार को इस दुनिया को छोड़ कर चले गए. शायद इसीलिए कहा जाता है कि जिंदगी बहुत छोटी है. यहां से कब कौन चला जाएगा ....नहीं कहा जा सकता. ओसियान फिल्म फैस्टीवल का समापन उस रात घोष की फिल्म चित्रांगदा की स्क्रीनिंग के साथ ही हुआ था. फिल्म खत्म होने पर जब बाहर निकले तो रितुपर्णों बाहर मिल गए. फिल्म में उनके शानदार अभिनय के लिए मैंने और मेरे कुछ मित्रों ने उन्हें बधाई दी. एक मित्र ने जैसे आने वाले वक्त को देख लिया था....और कहा कि रितुपर्णों जी के साथ एक तस्वीर हो जाए फिर पता नहीं कभी दोबारा मिल पांए या नहीं. उनसे अनुरोध किया तो मुस्कुराकर इनायत कर दी और अब मेरे पास उनकी यह याद शेष है. रितु दा के अभिनय और निर्देशन का जादू ऐसा था कि उनकी लगभग हर फिल्म को किसी न किसी श्रेणी में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजा गया और तमाम अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों से भी. अभी चंद रोज पहले की कहीं पढ़ा था कि वे व्योमकेश बख्शी के जासूसी चरित्र पर आधारित अपनी नई फिल्म 'सत्यानवेषी' की शूटिंग समाप्त कर चुके हैं...मानवीय संबंधों की जटिलताओं और तमाम मानवीय पहलुओं को संवेदनशीलता के साथ सिल्वर स्क्रीन पर रचने वाला वो चित्रकार चला गया. यह अपूर्णीय क्षति है....और मैं अभी भी इस ख़बर पर विश्वास नहीं कर पा रहा हूं.
संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संस्मरण लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 4 जून 2013
शनिवार, 3 नवंबर 2012
समंदर से पहली मुलाकात
मैंने कभी समंदर नहीं देखा था. बचपन से समंदर को महसूस करने की तलब थी जो आज देश के पूर्वी तट पर जगन्नाथ पुरी में जाकर पूरी हुई. समंदर से अपने प्रथम मिलन की अभिलाषा में मैं रात भर ठीक से सो भी न सका. समंदर पर खिलते सूर्योदय को देखने से न रह जाऊं...इस डर से रात में दो बार जाग कर घडी देख चुका था. खैर सुबह हुई.....और यहां पुरी में शायद कुछ ज्यादा जल्दी ही हो जाती है. मैं होटल सूर्या के अपने कमरे में बैड पर था और कुछेक फर्लांग दूर चिंघाड रहे समंदर को सुन सकता था. जीवन में पहली बार पहाड़, नदी, झरने या समंदर को देखना शायद जीवन के कुछ सबसे खास अनुभवों में शामिल हो जाता है. कल्पना में किसी चीज को देखना और फिर उसे आंखों से देखना...उसे छूना, महसूस करना...अंतर तो है. यहां मैं कुल तीन दिन ठहरने वाला हूं सो हर नए अनुभव को ठीक से जीने का मौका शायद एक से ज्यादा बार नहीं मिलेगा....ये बात बार बार हर चीज के प्रति अतिरिक्त रूप से सतर्क बना रही है.
खैर, सुबह 5.05 पर वो पल भी आया जिसका बरसों से इंतजार था. समंदर और मैं एक दूसरे के सामने थे. समुद्र तट पर ना आदमी न आदमी की जात....दूर तक सुनसान... हल्की नीली चांदनी को सूर्योदय की पहली किरणें चुनौती दे रही थीं....और हवा में मौजूद हल्की मीठी सी ठंडक से हाथों के रोएं उठ आए थे. धीरे धीरे बढ़ती सूरज की रौशनी से समंदर का पानी अब लाल हो चला था...और दूर जहां समंदर और आसमान शायद मिल रहे थे कुछ मछुआरों की नावें नज़र आने लगी थी. एक अजीब सा सन्नाटा और समुद्र की गर्जना मानो आपस में गुथ्थमगुथ्था होकर तीसरे आयाम को रच रहे हों. लहरें बार बार किनारे तक आती और लौट जाती. इससे पहले की यहां चहल पहल हो मैं समुद्र में घुल जाना चाहता था. अब मैं किनारे से कुछ कदम आगे पानी के बीचों बीच था...एक लाइफगार्ड अब तक यहां पहुंच चुका था. उसने पचास रू में आधे घंटे के लिए मेरी सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और पानी का आनंद लेने के कुछ टिप्स भी देता चला. बस फिर क्या था. मैं और समंदर बच्चों की तरह खेल रहे थे. वो हर लहर के साथ मुझे थोड़ा ऊपर की ओर उछाल देता और मेरे पैरों के नीचे से ढेर सारा पानी निकल जाने से लगता कि मैं तैर रहा हूं. और कभी-कभी पीछे से अचानक आकर पानी की लहर से धप्पा बोल देता. ये समंदर का उसकी गोद में खेलने वाले के साथ दोस्ती करने का अपना अंदाज था. तभी लाइफ गार्ड ने एक ट्यब मुझे पहना दी जिससे अब मैं कुछ और अंदर तक जाकर तैर सकता था. अब जमीन मेरे पैरों से काफी नीचे थी...पर मन में कोई डर नहीं. मैंने ऊपर की ओर उचक कर देखा तो सूरज ने आसमान पर अपना अधिकार जमा लिया था. मैंने चारों ओर देखा....और समंदर की विशालता पर अपने तिनके भर होने पर मुस्कुराया, ख्याल आया कि इसके पानी में न जाने कितना इतिहास घुला हुआ है और मानव सभ्यता के विकास का न जाने कब से ये ऐसे ही साक्षी रहा है, कहते हैं समंदर कुछ नहीं छोडता.....सब कुछ निगल लेता है, न जाने इसके तले में क्या क्या पडा हुआ होगा...थोडी देर में विचार शांत हुए तो मैं सिर्फ और सिर्फ पानी की हर लहर को महसूस कर रहा था और आंखें बंद कर न जाने कितनी देर समंदर की लहरों के साथ झूलता रहा........
(मेरी डायरी से पिछले साल आज ही के दिन का संस्मरण 3 नवंबर, 2011, जगन्नाथ पुरी, उडीसा)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
