गुरुवार, 6 जनवरी 2011
बेदर्द ठंड और खाली पेट गुजरी एक रात....
कल रात ऑफिस से आते आते रात के 9 बज गए और थकान और हड्डीयों तक घुस चुकी ठंड ने रजाई की शरण लेने पर मजबूर कर दिया और सोचा दस मिनट इस तीसरे आयाम में ठंड से निजात प्राप्त की जाए। बस फिर क्या था...कुछ उलझे से ख्यालों ने होश को आ घेरा सारे विचार आपस में गुथ कर गड्डमड होने लगे...फिर क्या हुआ साफ साफ याद नहीं । शायद नींद ने मुझे अपने आगोश में ले लिया। गैस के पास रखा डिनर इस इंतजार में सुस्ताता रहा कि रजाई में दुबका शख्स अब निकलेगा तब निकलेगा। पर ठंड ने रूह को इस कदर सताया था कि भूख पेट की अतल गहराइयों में जा छुपी और पूरी रात वहीं दुबकी रही। अचानक पेट में कोई हलचल हुई और आँख खुल गई .... कमरे की लाइट जल रही थी, मेरे ऊपर रजाई और रजाई के ऊपर अखबार पसरा पड़ा था। धीमी धीमी आवाज में पास चल रहे रेडियो पर कोई कुछ गा रहा था। गली का चौकीदार नीचे जोर जोर से डंडा पटका कर अपनी हाजिरी लगा रहा था। घडी में झांका तो देखा की छोटी सुंई पाँच के पास लटक रही है....और भूख पूरे शरीर में भटक रही है।
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